Bastar Dussehra 2026: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की खास धार्मिक रस्म काछनगादी शनिवार देर शाम जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी की जाएगी। इस दौरान पनका समाज की 12 वर्षीय पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी और बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा पर्व मनाने की अनुमति देंगी। इसके बाद दशहरा की अन्य धार्मिक रस्मों की शुरुआत होगी।
काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास कक्षा 5वीं की छात्रा हैं। इस परंपरा में शामिल होने से पहले उन्होंने करीब 9 दिनों तक देवी की पूजा-अर्चना की और उपवास रखा। पीहू चौथी बार इस धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन रही हैं। इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब 5 से 6 साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी।
अलग-अलग समाजों को मिली है जिम्मेदारी
बस्तर दशहरा में विभिन्न जातियों और गांवों के लोगों को अलग-अलग धार्मिक जिम्मेदारियां दी गई हैं। झारउमर और बेड़ाउमर गांव के ग्रामीणों को रथ निर्माण की जिम्मेदारी मिली है, जबकि काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या द्वारा निभाई जाती है। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।
22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला
काछनगादी की रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों से बना विशेष झूला भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लामनी निवासी जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से इस झूले को बनाने की जिम्मेदारी निभा रहा है।
परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर धार्मिक विधि से झूला तैयार करते हैं। इस दौरान परिवार के घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी जलाया जाता है। पीढ़ियां बदलने के बाद भी परिवार इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहा है।
नवरात्र से एक दिन पहले होती है काछनगादी रस्म
बस्तर दशहरा की प्रमुख धार्मिक रस्मों में शामिल काछनगादी हर साल नवरात्र शुरू होने से एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर काछनदेवी से पर्व आयोजन की अनुमति मांगते हैं।
देवी से अनुमति मिलने के बाद आतिशबाजी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी माना जाता है। पनका समाज की महिलाएं धनकुल वादन के साथ पारंपरिक गीत प्रस्तुत करती हैं।
रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व
बस्तर दशहरा की परंपराओं में रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व है। काछनगादी की रस्म के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का आयोजन किया जाएगा। इस धार्मिक आयोजन में बस्तर संभाग के अलावा अन्य क्षेत्रों से भी लोग शामिल होंगे।
रविवार से शुरू होंगी दशहरा की अगली रस्में
काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद रविवार को कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म शुरू होगी। इसके बाद बस्तर दशहरा के अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी शुरू हो जाएंगे। सदियों पुरानी यह परंपरा विभिन्न समुदायों, गांवों और परिवारों की आस्था व सहभागिता से आज भी जीवित है।






