Exclusive Report: कभी ये छत्तीसगढ़ की धरती अनाज के भंडार के लिए जानी जाती थी। यहाँ की मिट्टी से खुशबू आती थी मेहनत और विकास की। लेकिन आज वही धरती, जो कभी मेहनतकशों की पहचान थी, शराब के जाल में उलझकर अपनी असली पहचान खोती जा रही है। जहाँ कभी खेतों में हल चलता था, अब वहाँ ठेके की लाइटें चमकती हैं। जहाँ चौपालों में गीत गूंजते थे, वहाँ अब बोतलों की खनक सुनाई देती है। राज्य का हर कोना, हर गली, हर गाँव अब शराब की दुकानों से घिर चुका है। और अगर दुकान नहीं भी है, तो चिंता की कोई बात नहीं एक फोन कॉल और “नंबर माल” घर तक पहुँच जाता है।
दवाई के लिए पैसे नहीं, पर शराब के लिए जेब खाली नहीं रहती। घर में राशन न हो, बच्चों की फीस बाकी हो, लेकिन बोतल का इंतज़ाम हर हाल में होता है। यही है आज का कड़वा सच।
छत्तीसगढ़ में इस समय 4500 से ज़्यादा सरकारी शराब दुकानें खुली हुई हैं। मालिक खुद सरकार है। जितना भी सेल होता है, उसका सीधा मुनाफा सरकार की जेब में जाता है। लेकिन असली खेल तो टैक्स और कमीशन का है, जो सिस्टम की अंधेरी तिज़ोरी में गुम हो जाता है।
एक 180 ml की बोतल फैक्ट्री में सिर्फ़ 20–25 रुपये में बनती है, लेकिन ठेके में वही बोतल 80 रुपये में बिकती है।
50% टैक्स
25% VAT
और बाकी ट्रांसपोर्ट व कमीशन
मतलब एक बोतल पर 60–65% तक सिर्फ़ टैक्स और सिस्टम की जेब में चला जाता है।
फिर भी शराब की मांग घटती नहीं, बढ़ती जा रही है। आदमी कहता है “रोटी कम खा लेंगे, पर शराब नहीं छोड़ेंगे।” और सरकार सोचती है “पीओ मत, पर अगर पी रहे हो, तो पैसे हमें दो।”
चुनावी घोषणाओं में शराबबंदी का वादा करना आसान है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उस वादे को निभाना सबसे मुश्किल। शराब के कारण दुष्कर्म, एक्सीडेंट, अपराध और घरेलू हिंसा के मामले तेजी से बढ़े हैं। रिसर्च कहती है कि आम आदमी अपनी कुल कमाई का 15% शराब पर खर्च कर रहा है। तीन गुना बढ़ोतरी आखिर किसकी जेब में जा रही है? क्या यह टैक्स है या किसी सिस्टम की अंधेरी तिजोरी भरने का ज़रिया?
सरकार के आँकड़े कहते हैं कि शराब से राज्य का राजस्व मजबूत हो रहा है। लेकिन सवाल ये है अगर राजस्व मजबूत है, तो स्कूलों में बेंच खाली क्यों हैं? अस्पतालों में दवाइयाँ क्यों नहीं हैं? सड़कों में गड्ढे क्यों हैं?
सत्ताधारी दल कोई भी हो, हर कोई सत्ता से पहले “नशामुक्त छत्तीसगढ़” की बात करता है, लेकिन कुर्सी मिलते ही शराब से मिलने वाले अरबों के लालच में वही लोग जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने लगते हैं।
आज हालात ये हैं कि शराब ने केवल शरीर नहीं, आत्मा तक को खोखला कर दिया है। नशे में डूबे पिता, रोती हुई माँ, डरते हुए बच्चे यह अब किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि समाज की असल तस्वीर बन चुका है।
और अगर कहानी यहीं खत्म हो जाती, तो शायद उम्मीद बाकी रहती। लेकिन अब मामला सिर्फ शराब का नहीं बेरोज़गारी का भी है, टूटी उम्मीदों का भी।
आज का युवा, जो कल इस राज्य का भविष्य कहलाना चाहिए था, वो आज चाय–बिस्किट और ₹7 की मैगी में ज़िंदगी काट रहा है। हाथ में डिग्री है, पर जेब में नौकरी नहीं। रोज़ अख़बार में भर्ती की तारीख ढूँढता है, पर हर बार निराशा हाथ लगती है।
जो राज्य बिजली का उत्पादन करता है, वहीं के घरों में अंधेरा क्यों है? हमसे बिजली खरीदने वाले राज्य सस्ते दामों में खुश हैं, पर हम खुद महंगे बिलों से परेशान। सरकार अगर सच में विकास चाहती है, तो शराब की दुकानें नहीं, उद्योग और रोजगार केंद्र खोलने चाहिए थे ताकि युवाओं के हाथों में बोतल नहीं, उपकरण होते।
जब नीतियाँ पेट नहीं भरतीं, तो सरकारें जंगलों और ज़मीनों की तरफ रुख करती हैं। पेड़ों में विकास खोजने निकलीं, पर वहाँ भी घोटाले कर डाले। कभी “हरियाली” के लिए जाना जाने वाला छत्तीसगढ़ अब कोयले और भ्रष्टाचार की खबरों में छाया है।
नीतियाँ हैं, मगर नीयत नहीं। पैसा है, मगर पवित्रता नहीं। विकास के नाम पर अब बस विनाश हो रहा है।
आज जब शराब सस्ती है और शिक्षा महंगी, जब अस्पताल खाली हैं और ठेके भरे, तो सवाल उठना लाज़मी है
क्या ये विकास है या बर्बादी का उत्सव?
कहने को छत्तीसगढ़ बदल रहा है, पर सच्चाई ये है कि कुर्सियाँ बदलती हैं, नीयत नहीं।
हर सरकार वही गलती दोहराती है , नशे के सहारे राजस्व बढ़ाने की।
यह रिपोर्ट किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सच्चाई की आवाज़ है जिसे सुनना ज़रूरी है।
