Pola Tihar 2026: छत्तीसगढ़ में पोरा (पोला) और तीजा (हरतालिका तीज) कृषि और पारिवारिक जीवन से जुड़े सबसे प्रमुख लोक पर्व हैं। ये दोनों त्यौहार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और भादो (भाद्रपद) के महीने में सिर्फ 3 दिन के अंतराल पर मनाए जाते हैं। इस साल यानी आज पोरा तिहार मनाया जा रहा है और तीजा 13 सितंबर को मनाया जाएगा।
यहां दोनों त्यौहारों के पीछे की मान्यता और इन्हें मनाने की पूरी विधि विस्तार से दी गई है:
1. पोरा (पोला) त्यौहार
पोरा तिहार भादो मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस साल यानी आज 10 सितम्बर को पोरा तिहार मनाया जा रहा है।
क्यों मनाया जाता है और मान्यता क्या है?
पोरा मुख्य रूप से किसानों और कृषि का त्यौहार है। यह बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, क्योंकि वे साल भर खेतों में किसानों की मदद करते हैं। मान्यता है कि इस दिन ‘अन्न माता’ गर्भ धारण करती हैं (धान के पौधों में दूध भरता है), इसलिए इस दिन खेतों में जाना और कृषि कार्य करना पूरी तरह वर्जित होता है।
कैसे मनाया जाता है पोला त्यौहार ?
1.खेतों की पूजा
त्यौहार से एक रात पहले ‘गर्भ पूजा’ की जाती है। किसान अपने खेतों में जाकर विशेष पूजा करते हैं ताकि फसल अच्छी हो।2.बैलों का श्रृंगार
पोरा के दिन सुबह सबसे पहले बैलों को नहलाया जाता है। उनके सींगों को रंगा जाता है और उन्हें घुंघरू, कौड़ी के आभूषणों और फूलों की मालाओं से सजाया जाता है।3.बैलों की पूजा और विश्राम
इस दिन बैलों से कोई काम नहीं लिया जाता। घरों में उन्हें विशेष भोजन खिलाया जाता है और महिलाएं उनकी पूजा करती हैं।4.मिट्टी के खिलौनों की परंपरा
बच्चे इस दिन मिट्टी से बने बैलों (जिन्हें नंदिया बइला या पोरा कहा जाता है) और मिट्टी से बना रसोई के छोटे बर्तनों (चुकी-पोरा) से खेलते हैं। ग्रामीण इलाकों में बैलों की दौड़ भी आयोजित की जाती है।5.पारंपरिक व्यंजन
घरों में छत्तीसगढ़ के विशेष पकवान जैसे ठेठरी, खुरमी, गुड़ का चीला, बड़ा, पूड़ी और चौसेला बनाए जाते हैं, जिन्हें प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
तीजा त्यौहार पोरा के ठीक तीसरे दिन, भादो मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस साल 13 सितम्बर को है।
क्यों मनाया जाता है और मान्यता क्या है?
तीजा महिलाओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए इसे करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था, लेकिन उनके पिता राजा हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे। जब पार्वती जी ने यह बात अपनी सखियों को बताई, तो सखियां उन्हें घने जंगल अगवा कर ले गईं, ताकि विवाह टाला जा सके। उसी जंगल में माता पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाकर बिना अन्न-जल ग्रहण किए (निर्जला) कठोर तपस्या की। इसी दिन (भाद्रपद शुक्ल तृतीया को) भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। इसीलिए महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
तीजा तिहार की ख़ास बातें
तीजा के लुगरा : तीजा की मुख्य पूजा में महिलाएं जो नई साड़ी (लुगरा) और सुहाग का श्रृंगार पहनती हैं, वह अनिवार्य रूप से उनके मायके द्वारा उपहार में दिया जाता है। यह लुगरा मायके के सुरक्षा चक्र और कभी न खत्म होने वाले आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
करू भात (करेला): तीजा के उपवास से ठीक एक दिन पहले महिलाएं कम से कम तीन अलग-अलग घरों (पड़ोसियों या रिश्तेदारों) में जाकर ‘करू भात’ (करेले की सब्जी और चावल) खाती हैं। करेले की तासीर ठंडी होती है। यह उपवास के दौरान शरीर में पित्त (एसिडिटी) नहीं बढ़ने देता और प्यास को नियंत्रित करता है, जिससे महिलाओं को 24 घंटे का निर्जला व्रत सहने की शारीरिक शक्ति मिलती है। करेला खाने का एक अर्थ यह भी है कि वैवाहिक जीवन में आने वाली कड़वी सच्चाइयों और मुश्किलों को हंसते हुए स्वीकार करना चाहिए, ताकि रिश्ता हमेशा मीठा बना रहे।
गणेश चतुर्थी को फलाहार
तीजा का निर्जला व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रखा जाता है और इसके ठीक अगले दिन गणेश चतुर्थी होती है। चतुर्थी की सुबह महिलाएं स्नान करने के बाद शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इस दिन ठेठरी और खुरमी जैसे पारंपरिक पकवानों का भोग लगाया जाता है। फिर महिलाएं अपना 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत तोड़ती हैं।
व्रत खोलने के लिए सीधे अन्न नहीं खाया जाता, बल्कि तीखुर, सिंघाड़ा, साबूदाना, कतरा (सूजी) और मौसमी फलों का फलाहार ग्रहण किया जाता है। इसके बाद बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है, जिसके साथ यह पावन पर्व संपन्न होता है।




