Mukesh Khanna: अभिनेता मुकेश खन्ना ने राष्ट्रगान “जन गण मन” की जगह “वंदे मातरम” को अपनाने की मांग कर नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा कि “जन गण मन” को हटाकर “वंदे मातरम” को लाया जाना चाहिए। हालांकि, बयान देते समय उन्होंने राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को लेकर कई तथ्यात्मक गलतियां भी कर दीं।
मुकेश खन्ना ने कहा कि “वंदे मातरम को राष्ट्रगीत बनाना चाहिए”, जबकि “वंदे मातरम” पहले से ही भारत का राष्ट्रगीत है। इसके अलावा उन्होंने “जन गण मन” का उल्लेख करते समय उसके शब्दों का भी गलत उच्चारण किया और “पंजाब सिंध” की जगह “पंजाब सिंग” कहा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि “जन गण मन” ब्रिटेन की महारानी के सम्मान में लिखा गया था और इसकी जगह “वंदे मातरम” को अपनाया जाना चाहिए। यह दावा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है और इस संबंध में इतिहासकारों तथा रवींद्रनाथ ठाकुर के उपलब्ध दस्तावेजों में अलग-अलग संदर्भ मिलते हैं।
सरकार ने जारी किए नए दिशा-निर्देश
केंद्र सरकार ने राष्ट्रगान “जन गण मन” और राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” के गायन और वादन को लेकर सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
निर्देशों के अनुसार जिन कार्यक्रमों में दोनों का गायन या वादन किया जाएगा, वहां पहले “वंदे मातरम” और उसके बाद “जन गण मन” प्रस्तुत किया जाएगा। जिन राज्यों का अपना राज्य गीत है, वहां भी निर्धारित क्रम का पालन करने को कहा गया है।
सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों को उनके मूल शब्दों, सही उच्चारण और निर्धारित नियमों के अनुसार ही गाया और बजाया जाए। इसके लिए आधिकारिक पाठ भी उपलब्ध कराया गया है।
स्कूलों के लिए पहले भी जारी हुए थे निर्देश
इससे पहले 28 जनवरी को भी केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश जारी किए थे। इसके तहत स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” से करने और निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया था।
वंदे मातरम का इतिहास
“वंदे मातरम” की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। यह वर्ष 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास “आनंदमठ” में शामिल किया गया। वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने पहली बार इसे सार्वजनिक मंच से प्रस्तुत किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान “वंदे मातरम” देशभक्ति और आजादी के संघर्ष का प्रमुख उद्घोष बना।

