Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि 2026 का पावन पर्व पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। नवरात्रि के चौथे दिन आज मां दुर्गा के चौथे स्वरूप देवी कुष्मांडा की उपासना की जाती है। मां कुष्मांडा की आराधना से सुख-समृद्धि, बल, बुद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि माता बहुत शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों को अभय और मनचाहा वरदान देती हैं। लेकिन शास्त्रों में बताया गया है कि अगर उनकी पूजा में एक बड़ी गलती हो जाए तो व्रत खंडित हो सकता है और इसका दोष गर्भनाश जैसा होता है।

देवी कुष्मांडा का स्वरूप (Devi Kushmanda Puja)
देवी भागवत पुराण में मां कुष्मांडा को अष्टभुजाधारी बताया गया है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला विराजमान हैं। वह सिंह पर सवार रहती हैं। मां का स्वरूप शक्ति, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना गया है।
सृष्टि की आदि स्वरूप देवी कुष्मांडा (Navratri fourth day puja vidhi)
मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब देवी कुष्मांडा ने ही ब्रह्मांड की रचना की थी। उनका निवास सूर्यलोक में बताया गया है। मां की दिव्य आभा से ही दसों दिशाएं प्रकाशित होती हैं। वे समस्त सृष्टि की पालनहार और गर्भ में पल रही संतान की रक्षिका भी मानी जाती हैं।
गर्भ में संतान की रक्षिका हैं देवी कुष्मांडा (Navratri fasting mistake Garbhnash dosh)
ऋग्वेद में सूर्य का एक नाम हिरण्यगर्भ है, जिसका संबंध देवी कुष्मांडा से जोड़ा गया है। माना जाता है कि संसार की हर मां असल में देवी कुष्मांडा का ही स्वरूप हैं। देवी गर्भस्थ शिशु की रक्षा करती हैं और जन्म के बाद भी शिशु की देखभाल करती हैं।

शीघ्र प्रसन्न होने वाली माता
भक्तों की सच्ची सेवा और उपासना से मां कुष्मांडा शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं। उनकी पूजा से रोग-शोक का नाश होता है और आयु, बल, यश तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार, सच्चे मन से मां का ध्यान करने वाला भक्त आसानी से परम पद को प्राप्त कर सकता है।
लेकिन एक गलती से बिगड़ सकती है बात
बस आज के दिन साधक को खासकर महिलाओं के ध्यान रखने की जरूरत है कि भूल से भी एक गलती न हो जाए, वरना उनका व्रत खंडित हो सकता है. महिलाओं को ध्यान रखना है कि वह आज के दिन अपने हाथ से चाकू लेकर एक भरा-पूरा गोल कद्दू न काटें. इसके साथ ही देवी कुष्मांडा के ही नाम का एक और कद्दू जैसा फल होता है. स्थानीय स्तर पर इसे भतुआ (पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ गांव) कहते हैं, कुछ लोग इसे पेठा का फल भी कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस कुष्मांडा फल से ही पेठा नामकी मिठाई बनती है, जिसका भोग देवी को प्रिय भी है.
कद्दू-पपीता, नारियल से देवी का कनेक्शन
असल में कद्दू, पपीता, पेठा, नारियल, खरबूजा, तरबूज और गोल वाली लौकी इस तरह के सभी फल गर्भ के स्वरूप माने जाते हैं. इस स्वरूप के कारण ही इनमें कुष्मांडा का वास होता है. ऐसे में महिलाओं को वैसे भी इन सभी फलों को खुद से नहीं काटना चाहिए. व्रत वाले दिन, देवी पूजा के इस समय में तो यह कार्य बिल्कुल नहीं करना है. इसके पीछे का कॉन्सेप्ट ये है कि एक मां खुद अपने हाथ से ‘गर्भ नहीं उजाड़’ सकती.

इसलिए इन फलों को काटते या फोड़ते समय किसी कुंआरी कन्या से या फिर घर के किसी पुरुष सदस्य से इन फलों पर एक चीरा लगवाना चाहिए. या फिर दुकान से लाते समय है, दुकानदार से ही इसके टुकड़े करवा लेने चाहिए, या फिर चीरा लगवा देना चाहिए.
अव्वल तो नवरात्रि पर्व के चौथे दिन इनमें से कोई भी फल या सब्जी नहीं खानी चाहिए. और अगर बाकी किसी अन्य दिन खाना हो या सब्जी बनाना हो तो वही चीरा लगवाने वाला तरीका अपनाएं. इस तरह आपका देवी कुष्मांडा के व्रत का अनुष्ठान पूरा होगा और कोई दोष भी नहीं लगेगा.
