Pitru Paksha 2025: पितृपक्ष का समय शुरू होते ही घर-घर में पितरों को तृप्त करने के लिए थाली सजाई जाती है। पुरानी परंपरा है कि जब तक कौवे आकर भोजन ग्रहण नहीं करेंगे, तब तक पितरों तक अन्न नहीं पहुंचेगा। लेकिन सवाल यह है कि अब वे कौवे कहां हैं, जो कभी आंगन-आंगन मंडराते थे और अपनी कांव-कांव से घर-आंगन को गुंजायमान कर देते थे?

पितरों से कौवे का गहरा संबंध
कौवों का हमारे समाज में विशेष महत्व है। श्राद्ध और पितृपक्ष में इन्हें पितरों का प्रतीक माना जाता है। एक समय था जब भोजन की थाली रखते ही कौवे तुरंत आकर चुगने लगते थे। उनकी आवाज़ को शुभ माना जाता था- “कौवा बोला है, मेहमान आने वाला है।” लेकिन आज शहरीकरण, कंक्रीट के जंगल और शोरगुल ने जैसे कौवों को शहरों से दूर कर दिया है।

आख़िर क्यों घट रही कौवों की संख्या?
पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी बताते हैं कि रायपुर के बूढ़ा तालाब और मोतीबाग गार्डन जैसे इलाकों में कभी-कभार कौवे दिख जाते हैं। लेकिन पहले जैसी चहल-पहल अब नहीं है। उनकी संख्या लगातार घट रही है, और इसके साथ हमारी परंपराओं का एक अहम हिस्सा भी खोता जा रहा है।

शहरों में पेड़-पौधों की कमी, शोरगुल, और प्रदूषण ने जैसे पक्षियों को हमसे दूर कर दिया है. पहले जहां घर-घर में दाना-पानी रखा जाता था, अब व्यस्त जिंदगी के कारण वह भी नहीं हो पाता. श्राद्ध का समय आने पर ही हमें कौवों की याद आती है और हम सोचते हैं कि वे आएंगे, भोजन चुगेंगे और हमारे पितरों तक संदेश पहुंचाएंगे. कहीं न कहीं, एक सवाल हमारे मन में उठता है कि क्या हम इन परंपराओं को यूं ही लुप्त होते देख सकते हैं? क्या हमारी नई पीढ़ी भी वही सुनहरे पल देख पाएगी, जब कौवों का झुंड आंगन में मंडराता था और उनकी आवाज हमारे दिन की शुरुआत करती थी?
विशेषज्ञों का मानना है कि कौवों को बचाने के लिए हमें फिर से प्रकृति की ओर लौटना होगा। अपने घर के आंगन में दाना-पानी रखना होगा और उनके लिए सुरक्षित जगह बनानी होगी। तभी ये पक्षी वापस लौटेंगे और हमारी परंपराएं भी जीवित रहेंगी।
