विशेष आलेख: जन्मदिन विशेष
छत्तीसगढ़ की राजनीति में जब भी ठेठ गंवई माटी
से जुड़े नेतृत्व, आक्रामक तेवर और किसान हितैषी सरोकारों की बात होती है, तो भूपेश
बघेल का नाम सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आता है। प्रदेश की जनता जिन्हें आत्मीयता
से ‘कका’ और ‘दाऊ’ कहकर पुकारती है, उनका सियासी सफर किसी राजनीतिक घराने या तैयार
विरासत की छांव में नहीं पनपा, बल्कि खेतों की पगडंडियों, छात्र राजनीति के संघर्षों
और जनआंदोलनों की निरंतर तपिश में गढ़ा गया है। 23 अगस्त 1961 को दुर्ग जिले के ग्राम
बेलौदी में एक साधारण कृषक परिवार में पिता स्व. नंदकुमार बघेल एवं माता स्व. बिंदेश्वरी
बघेल के घर जन्मे भूपेश बघेल ने शून्य से शिखर तक की जो यात्रा पूरी की है, वह राज्य
और देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक अत्यंत प्रेरणादायी अध्याय है।
खेत-खलिहान से छात्र राजनीति और जनसरोकार की शुरुआत
एक कृषक परिवार में पले-बढ़े होने के कारण भूपेश
बघेल को बचपन में ही यह गहरा अहसास हो गया था कि छत्तीसगढ़ की असली धड़कन यहाँ के खेतों,
खलिहानों और पसीना बहाते अन्नदाताओं में ही बसती है। प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने
स्वयं खेती-किसानी का काम संभाला, हल चलाया और फसलों की मिंजाई तक के हर जमीनी काम
को गहराई से समझा। इसके बाद रायपुर के प्रतिष्ठित साइंस कॉलेज से उच्च शिक्षा और स्नातक
की पढ़ाई पूरी करने के साथ ही वे जनसेवा और राजनीति की मुख्यधारा में सक्रिय हो गए।
1980 के दशक में भारतीय युवा कांग्रेस से अपने
राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले भूपेश बघेल ने 1990 में दुर्ग जिला युवक कांग्रेस
के अध्यक्ष पद की कमान संभाली। इसके बाद वर्ष 1992 में सामाजिक सौहार्द और भाईचारे
की अलख जगाने के लिए उन्होंने 350 किलोमीटर की ऐतिहासिक सद्भावना पदयात्रा निकाली,
जिसने उन्हें एक संवेदनशील और जुझारू जननेता के रूप में स्थापित किया।
संसदीय जीवन का आगाज: 32 की उम्र में पहला चुनाव और प्रशासनिक दक्षता
• विधानसभा में पहला कदम: वर्ष 1993 में महज 32 वर्ष की युवावस्था में
उन्होंने अविभाजित मध्य प्रदेश की पाटन विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर ऐतिहासिक जीत हासिल
की और पहली बार विधानसभा की दहलीज लांघी। इसके बाद 1998, 2003, 2013 और 2018 में भी
पाटन की जनता ने उन पर निरंतर विश्वास जताया।
• मंत्रिमंडल में दायित्व: 1998 में दूसरी बार विधायक बनने के बाद दिग्विजय
सिंह सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया, जहाँ उन्होंने मध्य प्रदेश के परिवहन
मंत्री तथा राज्य सड़क परिवहन निगम के अध्यक्ष का कार्यभार कुशलता से संभाला।
• नवगठित छत्तीसगढ़ का निर्माण व पीएचई मंत्री
पद: 1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब
प्रथम मंत्रिमंडल में वे राजस्व, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) और राहत कार्य मंत्री
बने। पीएचई मंत्री के रूप में उन्होंने राज्य के दूरस्थ अंचलों में पेयजल संकट दूर
करने के लिए विशेष कार्ययोजनाओं को धरातल पर उतारा।
• सशक्त विपक्ष की भूमिका: 2003 से 2008 के दौर में विधानसभा में उपनेता
प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने तत्कालीन सत्तापक्ष की नीतियों के खिलाफ विधानसभा के
भीतर और बाहर जनता के हक की लड़ाई पूरी प्रखरता से लड़ी।
संकट के दौर में संगठन की कमान, पदयात्राएं और 2018 का प्रचंड जनादेश
मई 2013 में झीरम घाटी में हुए भीषण नक्सली
हमले में जब कांग्रेस ने अपने समूचे प्रथम पंक्ति के शीर्ष नेतृत्व को खो दिया था,
तब संगठन गहरे संकट, हताशा और शून्य में था। ऐसे अत्यंत चुनौतीपूर्ण समय में पार्टी
आलाकमान ने 2014 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की कमान भूपेश बघेल के मजबूत
कंधों पर सौंपी। उन्होंने बंद वातानुकूलित कमरों की राजनीति को पूरी तरह त्यागकर सड़कों
और धूल भरी पगडंडियों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। राज्यव्यापी पदयात्राओं, जन-जागरण
अभियानों और कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद स्थापित कर उन्होंने 15 वर्षों से सत्ता
से दूर पड़े संगठन में नया रक्त संचार किया। कार्यकर्ताओं के भीतर जीत का अटूट विश्वास
जगाते हुए उन्होंने 2018 के विधानसभा चुनाव में 90 में से 68 सीटों का ऐतिहासिक प्रचंड
बहुमत हासिल किया और 17 दिसंबर 2018 को छत्तीसगढ़ के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में
शपथ ग्रहण की।
शपथ के डेढ़ घंटे बाद त्वरित निर्णय और जनकल्याणकारी नीतियां
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के महज डेढ़ घंटे
के भीतर उन्होंने यह साबित कर दिया कि त्वरित फैसले और जनकल्याण ही उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता
है:
• ऐतिहासिक किसान कर्जमाफी: पदभार संभालते ही उन्होंने राज्य के 16.65
लाख से अधिक किसानों की कर्जमाफी की फाइल पर हस्ताक्षर किए और 2500 रुपये प्रति क्विंटल
की दर से धान खरीदी सुनिश्चित कर देश भर में एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की।
• आदिवासी अधिकारों की पुनर्बहाली: बस्तर के लोहांडीगुड़ा में एक दशक से अधिक
समय से अधिग्रहित की गई किसानों और आदिवासियों की जमीन को वास्तविक स्वामियों को वापस
लौटाकर देश में जमीन वापसी का पहला अनूठा उदाहरण पेश किया।
• स्थानीय युवाओं को रोजगार: छोटे भूखंडों (प्लॉट्स) की खरीद-बिक्री व रजिस्ट्री
पर लगी रोक हटाई गई, साथ ही शिक्षा विभाग में 14,500 से अधिक सहायक शिक्षकों, प्रोफेसरों
और बिजली विभाग में हजारों पदों पर सीधी भर्तियां कर युवाओं को बड़ा संबल दिया।
• कोरोना संकट में उत्कृष्ट प्रबंधन: कोविड-19 महामारी की भीषण लहरों के दौरान जब
पूरा देश ऑक्सीजन और स्वास्थ्य संसाधनों की कमी से जूझ रहा था, तब छत्तीसगढ़ ने न केवल
राज्य के भीतर स्थिति संभाली, बल्कि भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) के जरिए देश के अनेक
राज्यों में जीवनदायिनी ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की।
जल संरक्षण की ऐतिहासिक दृष्टि: ‘इंदिरा गांव गंगा योजना’ से ‘नरवा विकास’ तक
छत्तीसगढ़ में जल संकट के समाधान और ग्रामीण
निस्तारी व्यवस्था को सुदृढ़ करने के प्रति भूपेश बघेल की दृष्टि हमेशा से जमीनी रही
है:
• इंदिरा गांव गंगा योजना का संबल: राज्य गठन के शुरुआती दौर में जब वे पीएचई
मंत्री रहे, तब ग्रामीण अंचलों में निस्तारी और पेयजल संकट को दूर करने के लिए ‘इंदिरा
गांव गंगा योजना’ को गति दी गई। इसके अंतर्गत गांवों के सूखते तालाबों को भरने और भूजल
स्तर को रिचार्ज करने के लिए नलकूपों व विशेष जल-संरचनाओं का निर्माण कराया गया।
• सौर ऊर्जा से जल-संवर्धन: मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस विजन
को आधुनिक तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ा। ‘सुराजी गांव योजना’ के माध्यम से नदियों
व एनीकटों के जल को सौर ऊर्जा पंपों (Solar Pumps) के जरिए ग्रामीण तालाबों तक पहुँचाने
के कार्यों को प्राथमिकता दी गई, जिससे भीषण गर्मी में भी मवेशियों के लिए पानी और
ग्रामीणों के लिए निस्तारी की सुविधा बारह महीने सुनिश्चित हुई।
• नरवा विकास से भूजल स्तर में सुधार: राज्य के हजारों बरसाती नालों पर वैज्ञानिक
तरीके से चेकडैम, स्टॉपडैम और बोल्डर चेक बनाकर भूजल स्तर को कई फीट ऊपर उठाने का काम
किया गया।
बस्तर में बदलाव: देवगुड़ी जीर्णोद्धार और दंतेवाड़ा का ‘डेनेक्स’ गारमेंट क्रांति
बस्तर के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में आस्था
के सम्मान के साथ-साथ स्थानीय आजीविका और महिला स्वावलंबन का एक नया अध्याय भूपेश बघेल
के कार्यकाल में लिखा गया:
• आस्था के केंद्रों को नवजीवन: बस्तर संभाग के ग्राम्य देवी-देवताओं के पवित्र
स्थलों ‘देवगुड़ी’ और जनजातीय परंपरा व सामाजिक चेतना के केंद्र ‘घोटुल’ का बड़े पैमाने
पर जीर्णोद्धार कराया गया। डीएमएफ (DMF) फंड से सैकड़ों देवगुड़ियों का संरक्षण कर
संस्कृति को नई पहचान दी गई।
• ‘डेनेक्स’ गारमेंट फैक्ट्री और महिला स्वावलंबन: दंतेवाड़ा जैसे संवेदनशील अंचल में ‘दंतेवाड़ा
नेक्स’ (DANEX) गारमेंट फैक्ट्री की स्थापना भूपेश बघेल सरकार की सबसे क्रांतिकारी
पहलों में से एक रही। कभी संघर्ष के साये में रहने वाली स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण
महिलाओं को आधुनिक सिलाई मशीनों का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया गया।
• वैश्विक ब्रांड्स से जुड़ाव: इन गारमेंट यूनिट्स के जरिए तैयार परिधानों
को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के बड़े ब्रांड्स तक पहुँचाया गया, जिससे हजारों
स्थानीय दीदियों को घर के पास ही नियमित मासिक आय और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हुई।
• संस्कृति को संस्थागत पहचान: बस्तर में ‘बादल’ (Bastar Academy of
Dance, Art and Literature) संस्थान की स्थापना कर स्थानीय बोलियों, लोकनृत्य और हस्तशिल्प
को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाई गई।
‘छत्तीसगढ़ मॉडल’: जब विरोधी विचारधारा और आरएसएस ने भी की योजनाओं की सराहना
भूपेश बघेल द्वारा शुरू की गई योजनाएं केवल
लोक-लुभावन घोषणाएं नहीं थीं, बल्कि वे स्थानीय संसाधनों और ग्रामीण अर्थतंत्र को मजबूती
देने वाले ठोस मॉडल थीं:
• गोधन न्याय योजना व नरवा-गरुवा-घुरवा-बारी: पशुपालकों से ₹2 प्रति किलो गोबर और गोमूत्र
की खरीदी कर वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने की ‘गोधन न्याय योजना’ और गौठानों के ग्रामीण
मॉडल की गूंज देश भर में सुनाई दी।
• वैचारिक सीमाओं से परे प्रशंसा: इस नवाचार की सराहना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(RSS) के पदाधिकारियों ने भी खुलकर की और पर्यावरण व ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इसे
बेहद उपयोगी बताते हुए राज्य सरकार के कदमों का समर्थन किया।
• राष्ट्रीय मंचों पर सराहना: नीति आयोग की बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी सहित देश के अनेक राज्यों ने इस योजना की उपयोगिता को सराहा और मध्य प्रदेश, झारखंड
जैसे राज्यों ने इसे अपने यहाँ लागू करने के प्रयास किए।
• सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्स्थापना: हरेली, तीजा-पोरा, कर्मा जयंती, विश्व आदिवासी
दिवस और छठ महापर्व पर शासकीय अवकाश घोषित कर छत्तीसगढ़ी अस्मिता को राष्ट्रीय स्तर
पर मान दिलाया। साथ ही ‘छत्तीसगढ़िया ओलंपिक’ के जरिए पारंपरिक खेलों (गिल्ली-डंडा,
भौंरा, बांटी, फुगड़ी) को पुनर्जीवित किया।
राष्ट्रीय फलक पर ओबीसी राजनीति के सशक्त चेहरे और संगठन के चाणक्य
वर्तमान में भूपेश बघेल की पहचान केवल एक प्रांतीय
नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राष्ट्रीय स्तर पर देश के सबसे प्रखर, अनुभवी और प्रभावशाली
ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) नेताओं में प्रमुखता से गिने जाते हैं। पिछड़े, शोषित और
वंचित वर्गों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए उनकी स्पष्ट सोच और मुखरता के चलते केंद्रीय
नेतृत्व उन पर गहरा भरोसा करता है।
• राज्यों में चुनावी रणनीतिकार: चाहे पंजाब के प्रभारी के रूप में जटिल सियासी
समीकरणों को साधना हो, या फिर उत्तर प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों
के विधानसभा चुनावों में केंद्रीय पर्यवेक्षक व मुख्य रणनीतिकार की भूमिका निभाना—पार्टी
आलाकमान ने जब भी किसी राज्य में रणनीतिक कौशल की आवश्यकता महसूस की, भूपेश बघेल सबसे
भरोसेमंद चेहरे के रूप में आगे रहे।
• अद्वितीय बूथ मैनेजमेंट का फॉर्मूला: उनके सूक्ष्म ‘माइक्रो-लेवल बूथ मैनेजमेंट’
की चर्चा पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में होती है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की
सक्रिय मैपिंग, पन्ना प्रभारियों का सशक्त नेटवर्क और मतदाताओं से सीधा जीवंत संपर्क
स्थापित करने की उनकी रणनीति को आज अनेक राज्यों के चुनावों में एक सफल मॉडल के रूप
में देखा और अपनाया जाता है।
मेरा व्यक्तिगत संस्मरण: अध्ययनशील व्यक्तित्व और गहरा दार्शनिक ज्ञान
मुझे व्यक्तिगत रूप से कई सार्वजनिक, सांस्कृतिक
और सामाजिक कार्यक्रमों में उनके अत्यंत करीब रहने और उनके भाषणों को गहराई से सुनने
का प्रत्यक्ष अवसर मिला है। आम तौर पर लोग भूपेश बघेल जी को एक आक्रामक, मुखर और ठेठ
गंवई मिजाज के राजनेता के रूप में ही जानते हैं, लेकिन उनका वैचारिक, साहित्यिक और
दार्शनिक पक्ष किसी भी प्रबुद्ध चिंतक को विस्मित कर देने वाला है।
मुझे विशेष रूप से भगवान महावीर जयंती का वह
ऐतिहासिक कार्यक्रम याद है, जब उन्होंने मंच संभाला था। उस दिन उन्होंने जैन दर्शन,
भगवान महावीर के पंच महाव्रत, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और स्याद्वाद के अत्यंत गूढ़ व
सूक्ष्म सिद्धांतों को जिस सरल, व्यावहारिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर धाराप्रवाह
रूप से प्रस्तुत किया, उसने सभागार में उपस्थित प्रबुद्ध जैन मुनियों, धर्माचार्यों
और वरिष्ठ विद्वानों को आश्चर्यचकित कर दिया था। हर कोई उनके गहन अध्ययन और विषय पर
मजबूत पकड़ को देखकर दंग रह गया।
ठीक इसी प्रकार, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
2021 के अवसर पर दिया गया उनका ओजस्वी उद्बोधन आज भी मेरे जेहन में पूरी तरह जीवंत
है। उन्होंने योग को केवल शारीरिक आसनों और प्राणायाम तक सीमित न रखकर उसे मानसिक एकाग्रता,
आत्म-संयम, अंतर्मन की शुद्धि और निःस्वार्थ जनसेवा के आध्यात्मिक मार्ग के रूप में
जिस दार्शनिक गहराई से प्रस्तुत किया था, उसने पंडाल में मौजूद हर वर्ग के श्रोता को
मंत्रमुग्ध और सम्मोहित कर दिया था। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा की आत्मीय मिठास के साथ गंभीर
दार्शनिक और वैचारिक विषयों का ऐसा दुर्लभ संगम किसी राजनेता में देख पाना वास्तव में
एक अविस्मरणीय अनुभव है।
अडिग हौसले वाले जननेता की अमिट पहचान
विपक्षी राजनीति में संघर्ष करते हुए कार्यकर्ताओं
के कंधों पर बैठकर बैरिकेड्स तोड़ने का अदम्य साहस हो या देश के बड़े मंचों पर सामाजिक
न्याय के लिए बेबाकी से अपनी बात रखना, भूपेश बघेल हर चुनौती के सामने चट्टान की तरह
अडिग नजर आते हैं। सत्ता की कुर्सी पर रहें या विपक्ष में जनहित के लिए संघर्षरत, उनकी
राजनीति का केंद्र बिंदु हमेशा किसान, मजदूर, युवा और छत्तीसगढ़िया अस्मिता ही रहा
है।
जन्मदिन के इस गरिमामय अवसर पर हम सब प्रदेशवासी
उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु जीवन, अटूट ऊर्जा और राष्ट्र सेवा के संकल्पों की निरंतर
सिद्धि के लिए हृदय से मंगलकामना करते हैं।
लेखक के विचार – यह विशेष आलेख कांग्रेस कार्यकर्ता एवं लेखक दीप सारस्वत द्वारा लिखा गया है। लेख में व्यक्त विचार, आकलन और व्यक्तिगत अनुभव पूर्णतः लेखक के निजी विचार हैं। Thiha Chhattisgarh News Channel अथवा इसके संपादकीय मंडल का इन विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।
लेखक: दीप सारस्वत
कांग्रेस कार्यकर्ता एवं सामाजिक-राजनीतिक विषयों के लेखक
