Sharad Purnima 2026: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के करमागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर 500 साल पुरानी बल पूजा की परंपरा निभाई गई। रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी माने जाने वाली मां मानकेश्वरी देवी के मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु बकरे लेकर पहुंचे। इस बार करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई।
पूजा के दौरान बैगा द्वारा बकरों का खून पीने का वीडियो भी सामने आया है। मंदिर समिति के सदस्यों और श्रद्धालुओं के अनुसार, मान्यता है कि इस दिन बैगा के शरीर में देवी का वास होता है और वह बलि दिए गए बकरों का खून ग्रहण करते हैं।
बल पूजा से एक रात पहले निशा पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, पूजा के दिन यह अंगूठी बैगा के अंगूठे में कस जाती है।
रायगढ़ के अलावा ओडिशा और आसपास के कई क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु इस पूजा में शामिल होने पहुंचते हैं। श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में बकरा चढ़ाते हैं। राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है।
500 साल पुरानी है बल पूजा की परंपरा
जिला मुख्यालय से करीब 27 किलोमीटर दूर करमागढ़ में मां मानकेश्वरी देवी का मंदिर स्थित है। यहां हर साल शरद पूर्णिमा के दिन विशेष बल पूजा का आयोजन किया जाता है। देवी को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता है।
मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव के अनुसार, यह परंपरा करीब 500 वर्षों से चली आ रही है। पूजा में शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
50 से 60 बकरों की दी गई बलि
शरद पूर्णिमा के दिन दोपहर बाद मंदिर में बल पूजा शुरू हुई। व्यवस्था बनाए रखने के लिए मंदिर परिसर में बैरिकेडिंग की गई थी। इसके बाद विधि-विधान से पूजा संपन्न कर बलि की परंपरा पूरी की गई।
इस बार करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई। समिति के सदस्यों के अनुसार, कुछ वर्षों में यह संख्या 100 से 120 तक पहुंच जाती है।
बैगा ने पिया खून
बल पूजा के दौरान बैगा द्वारा बकरों का खून पीने का वीडियो सामने आया है। समिति के सदस्यों का कहना है कि धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दौरान बैगा के शरीर में देवी का वास होता है। श्रद्धालु बैगा के पैर धोकर और दूध चढ़ाकर पूजा करते हैं।
एक रात पहले होती है निशा पूजा
बल पूजा से पहले रात में निशा पूजा की जाती है। इस दौरान राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है। समिति के अनुसार, सामान्य दिनों में यह अंगूठी ढीली रहती है, लेकिन पूजा के दिन अंगूठे में कस जाती है।
मनोकामना पूरी होने पर पहुंचते हैं श्रद्धालु
मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में रायगढ़ के साथ ही ओडिशा और अन्य दूरस्थ क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहां मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। संतान प्राप्ति और अन्य परेशानियों से राहत के लिए श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं।
मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर बकरा चढ़ाते हैं। बल पूजा के दौरान करमागढ़ और आसपास के क्षेत्र में श्रद्धा और आस्था का माहौल बना रहता है।
राजपरिवार ने बताया रियासतकाल की परंपरा
राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि मां मानकेश्वरी देवी की पूजा की यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि आज भी क्षेत्र के लोग इस परंपरा और मां के प्रति अपनी आस्था को बनाए हुए हैं।




