Bastar Dussehra 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा की परंपराओं और जनजातीय संस्कृति की सराहना की

Bastar Dussehra 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जगदलपुर में आयोजित विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल होकर बस्तर की अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, सामूहिक आस्था, सामाजिक एकता और जनजातीय विरासत का जीवंत प्रतीक है।

Bastar Dussehra 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जगदलपुर में आयोजित विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल होकर बस्तर की अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, सामूहिक आस्था, सामाजिक एकता और जनजातीय विरासत का जीवंत प्रतीक है।

राष्ट्रपति ने मां दंतेश्वरी को नमन करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा में विभिन्न समुदायों, गोत्रों और समाज के सभी वर्गों की भागीदारी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। रथ निर्माण से लेकर पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों तक हर समुदाय अपनी पारंपरिक जिम्मेदारी निभाता है। यह परंपरा सामाजिक एकता और आपसी सहयोग का अनोखा उदाहरण है।

मुरिया दरबार लोकतांत्रिक परंपराओं का उदाहरण

राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित होने वाले मुरिया दरबार को जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इसमें समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और सामाजिक विषयों पर चर्चा करते हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद और सामूहिक निर्णय की यह परंपरा समाज में सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करती है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय युवाओं को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

जनजातीय प्रतिभाओं को अवसर देने की जरूरत

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समाज में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। सही अवसर, संसाधन और प्रोत्साहन मिलने पर जनजातीय समाज के युवा देश और दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं।

उन्होंने बस्तर ओलंपिक में युवाओं की भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि खेल प्रतिभाओं को उचित मंच मिलने से बस्तर के युवा भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।

बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को बताया महत्वपूर्ण

राष्ट्रपति ने बस्तर क्षेत्र के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र का संबंध दंडकारण्य से जुड़ा हुआ है। भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी से जुड़े प्रसंग बस्तर की सांस्कृतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की मर्यादा और माता शबरी की भक्ति से प्रेरणा लेकर समाज को नैतिकता और मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण सभी की जिम्मेदारी है।

प्रकृति संरक्षण जनजातीय जीवन का हिस्सा

राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति संरक्षण की परंपरा की प्रशंसा करते हुए कहा कि जंगल, पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन उनके जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें जल, हवा, भोजन और औषधियां प्रदान करती है, इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य तैयार किया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ के विकास कार्यों का किया उल्लेख

राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ में विकास की नई संभावनाएं बन रही हैं। जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने के प्रयास समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

उन्होंने विश्वास जताया कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में जनजातीय समाज की भूमिका और मजबूत होगी।

बस्तर दशहरा की परंपराओं का किया उल्लेख

राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा के पारंपरिक अनुष्ठानों का उल्लेख करते हुए कुटुम्ब जात्रा, ग्राम देवी-देवताओं की विदाई और माँ दंतेश्वरी तथा देवी मावली की डोली विदाई जैसे आयोजनों को इस उत्सव की विशेष पहचान बताया।

उन्होंने माँ दंतेश्वरी से बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य, छत्तीसगढ़ की प्रगति और प्रदेश के विकास की कामना की।

मुख्यमंत्री ने गिनाईं बस्तर विकास की योजनाएं

मुख्यमंत्री ने कहा कि मुरिया दरबार जनजातीय संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं की सुंदर अभिव्यक्ति है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा बस्तर की लोक संस्कृति और सामाजिक एकता को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार बस्तर के विकास के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन योजना के तहत अंदरूनी क्षेत्रों को सड़क मार्ग से जोड़ा जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि रायपुर से रावघाट तक रेल सेवा शुरू की गई है और रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन का काम जारी है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे व्यवस्था और वन धन केंद्रों के माध्यम से ग्रामीणों को लाभ पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मांझियों का मानदेय 2 हजार रुपये से बढ़ाकर 5 हजार रुपये और चालकी का मानदेय 1500 रुपये से बढ़ाकर 3500 रुपये किया गया है।

 

 

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