Bastar Dussehra 2026: बस्तर दशहरे की महत्वपूर्ण रस्म मावली परघाव मंगलवार देर शाम धूमधाम से पूरी हुई। इस दौरान मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली का बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव समेत हजारों श्रद्धालुओं ने स्वागत किया। राजपरिवार ने कांटाबंद पहनकर 618 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन किया।
माता के स्वागत के लिए जगदलपुर की सड़कों पर फूलों की चादर बिछाई गई। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह से फूल बरसाकर माता का स्वागत किया। इस दौरान आतिशबाजी भी की गई। माता की डोली और छत्र के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। घरों की छतों पर भी लोग माता के स्वागत के लिए मौजूद रहे।
दंतेवाड़ा के कलेक्टर और एसपी भी माता की डोली और छत्र के साथ जगदलपुर पहुंचे। यहां राजपरिवार के सदस्यों, प्रशासनिक अधिकारियों और श्रद्धालुओं ने परंपरा के अनुसार माता का स्वागत किया।
कांटाबंद पहनकर निभाई राजपरिवार की परंपरा
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि मावली परघाव की रस्म के दौरान बस्तर के राजा कांटाबंद पहनकर माता की आराधना करते थे। कांटाबंद फूलों से बना विशेष ताज होता है, जिसे राजा सिर पर धारण करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस ताज में इस्तेमाल होने वाला फूल बस्तर के जंगलों में पाया जाता है। परंपरा के अनुसार कांटाबंद पहनकर उन्होंने मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली को प्रणाम किया। इसके बाद माता की डोली को कंधे पर उठाकर राजमहल लाया गया।
कमलचंद्र भंजदेव ने कहा कि मां दंतेश्वरी और मां मावली बस्तर राजपरिवार की कुल देवी हैं। दोनों देवियां सदियों से बस्तर दशहरे में शामिल होती आ रही हैं। दशहरा आयोजन पूरा होने तक माता राजमहल परिसर में विराजमान रहेंगी।
विदेशी पर्यटकों ने भी देखी बस्तर की परंपरा
मावली परघाव की रस्म देखने के लिए बस्तर के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे। डेनमार्क से आए विदेशी पर्यटकों का समूह भी इस ऐतिहासिक परंपरा का साक्षी बना।
ओडिशा से आए श्रद्धालुओं ने बताया कि उन्होंने पहली बार माता के दर्शन किए। वहीं विदेशी पर्यटकों ने बस्तर की संस्कृति और यहां की परंपराओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरे की रस्में काफी अनोखी हैं और यहां की धार्मिक परंपराएं दूसरी जगहों से अलग हैं।
दंतेवाड़ा जाकर दिया गया था दशहरे का निमंत्रण
परंपरा के अनुसार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव शारदीय नवरात्र की पंचमी पर दंतेवाड़ा पहुंचे थे। वहां उन्होंने मां दंतेश्वरी को मंगल पत्र देकर बस्तर दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया था।
इसके बाद अष्टमी के दिन मां दंतेश्वरी का छत्र और मां मावली की डोली जगदलपुर के लिए रवाना हुई। मंगलवार देर शाम मावली परघाव की रस्म पूरी की गई, जिसमें राजपरिवार ने पारंपरिक तरीके से माता का स्वागत किया।
जोगी उठाई के साथ आगे बढ़ी दशहरे की परंपरा
बस्तर दशहरे के तहत सिरहासार भवन में जोगी उठाई की रस्म भी पूरी की गई। इस परंपरा में जोगी 9 दिनों तक उपवास रखकर कुंड में बैठकर माता की आराधना करते हैं।
9 दिनों की तपस्या पूरी होने के बाद जोगी को कुंड से बाहर निकाला गया। बस्तर दशहरे में जोगी उठाई की रस्म का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है।
विजय रथ की परिक्रमा के बाद होगी भीतर रैनी रस्म
बस्तर दशहरे में अब आगे विजय रथ की परिक्रमा की जाएगी। आठ चक्कों वाले इस रथ को किलेपाल क्षेत्र के ग्रामीण खींचेंगे। परिक्रमा पूरी होने के बाद भीतर रैनी की परंपरा निभाई जाएगी।
भीतर रैनी रस्म में ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से विजय रथ को अपने साथ ले जाते हैं। बस्तर दशहरे की यह पुरानी परंपरा आज भी स्थानीय संस्कृति और आस्था का अहम हिस्सा बनी हुई है।





