Bhangaram Mai Jatra: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले के केशकाल क्षेत्र में स्थित सुरडोंगर की पहाड़ियों में हर साल एक ऐसी अनूठी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है, जो देश-दुनिया के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है। यह है भंगाराम माई जातरा, जहां सिर्फ देवी-देवताओं की पूजा नहीं होती, बल्कि उनकी “अदालत” भी लगती है। मान्यता है कि इस दरबार में उन देवी-देवताओं की पेशी होती है, जिनसे जुड़े गांवों के लोग अपनी परेशानियों और शिकायतों को लेकर पहुंचते हैं।
भंगाराम माई का मंदिर बस्तर की आदिवासी संस्कृति, आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। हर वर्ष आयोजित होने वाली इस जातरा में कोंडागांव जिले के साथ-साथ पूरे बस्तर संभाग और छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा पड़ोसी राज्यों मध्यप्रदेश और ओडिशा से भी लोग इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल होने आते हैं। इस दौरान देवी-देवताओं के प्रतीक, आंगा देव, सिरहा, गुनिया, मांझी और गायता सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होते हैं।
भादों महीने में होती है भंगाराम माई जातरा
भंगाराम माई जातरा का आयोजन प्रतिवर्ष भादों महीने में किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार भादों महीने के पहले शनिवार से मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना शुरू होती है, जो अंतिम शनिवार तक चलती है। इसी अंतिम शनिवार को मुख्य जातरा आयोजित होती है, जिसे देवताओं की पेशी और अदालत लगने का दिन माना जाता है। शासन-प्रशासन द्वारा यहां उचित व्यवस्था की जाती है।
जातरा के दिन दूर-दराज के गांवों से लोग अपने-अपने ग्राम देवताओं के प्रतीक लेकर भंगाराम माई के दरबार में पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवी-देवताओं की यात्रा निकाली जाती है। मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद सभी देवताओं की उपस्थिति में विशेष पूजा और सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होती है।
देवताओं की अदालत क्यों लगती है?
बस्तर के आदिवासी समाज में प्रत्येक गांव के अपने अलग-अलग देवी-देवता होते हैं। इन देवताओं को गांव की रक्षा, बीमारी दूर करने, फसल की सुरक्षा और सुख-शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी दी जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि यदि कोई देवता अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, पूजा-अर्चना के बाद भी गांव में लगातार परेशानियां बनी रहती हैं या लोगों की मनोकामनाएं पूरी नहीं होतीं, तो उसकी शिकायत भंगाराम माई के दरबार में की जाती है। इसी विश्वास के आधार पर भंगाराम माई के मंदिर में साल में एक बार देवताओं की अदालत लगती है। इसे बस्तर की सदियों पुरानी सामाजिक और धार्मिक न्याय व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है।
कैसे होती है देवताओं की पेशी?
देवताओं की अदालत में गांव के लोग अपने ग्राम देवता के प्रतीक चिन्ह जैसे आंगा, डोली, छत्र या अन्य धार्मिक प्रतीकों को लेकर पहुंचते हैं। संबंधित देवता के प्रतिनिधि के रूप में सिरहा या पुजारी भी मौजूद रहते हैं। आदिवासी मान्यता के अनुसार देवता की शक्ति उसके प्रतिनिधि पर आती है और उसी माध्यम से देवता अपनी बात रखते हैं।
बस्तर के आदिवासी इलाकों में हर गांव में अनेक देवता माने जाते हैं, उन्हें अलग-अलग प्रतीकों या मूर्तियों के रूप में पूजा जाता है। देवताओं के काम भी बंटे हुए हैं। कोई बीमारी का इलाज करते हैं तो कोई फसलों की रक्षा करते हैं। जो देवता अपने भक्तों की मांग पूरी नहीं करते या उन्हें परेशान करते हैं उनकी शिकायत भंगाराम माई से की जाती है। भंगाराम माई के प्रधान पुजारी या सिरहा इस पूरी प्रक्रिया का संचालन करते हैं। ग्रामीण अपनी समस्या और शिकायत बताते हैं। इसके बाद देवता के प्रतिनिधि से पूछताछ की जाती है और परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जाता है।
देवताओं को क्यों दी जाती है सजा?
आदिवासी समाज में देवी-देवताओं को भी जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि जिस देवता को गांव की रक्षा का दायित्व दिया गया है, यदि वह अपने भक्तों की रक्षा नहीं कर पाता तो उसे जवाबदेह बनाया जाता है। यदि सुनवाई के बाद किसी देवता को दोषी माना जाता है तो उसे प्रतीकात्मक सजा दी जाती है। यह सजा भंगाराम माई के आदेश के रूप में मानी जाती है।
कैसे दी जाती है देवताओं को सजा?
दोषी माने गए देवताओं के प्रतीक चिन्हों को भंगाराम माई मंदिर परिसर में एक निश्चित स्थान पर छोड़ दिया जाता है। इस स्थान को देवताओं के विश्राम स्थल या देवताओं की जेल के रूप में भी जाना जाता है। यहां देवता के प्रतीकों को एक वर्ष तक रखा जाता है। वर्षभर तक गांव में परेशान करने वाले ऐसे देवी-देवता या बाहरी शक्तियों को वांक्षित वस्तुओं को भेंट कर ग्राम की देवी शीतला की पूजा की जाती है और परेशान करने वाले देव के नाम पर इकठ्ठा की गई वस्तुओं को टोकने में रखकर गांव के बाहर रख दिया जाता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर दंडित देवताओं के प्रतीक रखे जाते हैं, वहां रखी गई वस्तुओं की कोई चोरी नहीं करता। यहां तक कि यदि सोने-चांदी के आभूषण या अन्य कीमती सामान भी रखा हो तो वह सुरक्षित रहता है। ग्रामीण इसे भंगाराम माई की शक्ति और न्याय का प्रमाण मानते हैं।
एक वर्ष बाद होती है देवताओं की विदाई
सजा की अवधि पूरी होने के बाद अगले जातरा में इन देवी-देवताओं की विधि-विधान से विदाई की जाती है। सुबह से शुरू होने वाली यह प्रक्रिया देर शाम तक चलती है। इसके बाद ग्रामीण अपने-अपने देवताओं को वापस लेकर जाते हैं।
भंगाराम माई की सबसे बड़ी मान्यता यह है कि उनकी अनुमति के बिना क्षेत्र में किसी नए देवता की स्थापना या पूजा की शुरुआत नहीं की जाती। उन्हें सभी देवी-देवताओं की मुखिया के रूप में माना जाता है।


